​राखी /रक्षा बंधन 18 अगस्त 2016  (गुरुवार) को  मनाया जाएगा

हमारा देश भारत त्योहारो का देश है । यहाँ विभिन्न प्रकार के त्योहार मनाए जाते है। हर त्योहार अपना विशेष महत्त्व रखता है । रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक त्योहार है । यह भारत की गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक त्योहार भी है । यह दान के महत्त्व को प्रतिष्ठित करने वाला पावन त्योहार है । हम सभी जानते है की रक्षा बंधन का त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। उत्तरी भारत मे यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम को समर्पित है और इस त्यौहार का प्रचलन सदियों पुराना बताया गया है। इस दिन बहने अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और भाई अपनी बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हुए अपना स्नेहाभाव दर्शाते है।

रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । इस वर्ष 2016 मे रक्षा बंधन का त्यौहार 18 अगस्त (गुरुवार) को मनाया जायेगा । वैदिक काल मे श्रावण मास मे ऋषिगण आश्रम मे रहकर अध्ययन और यज्ञ करते थे । श्रावण-पूर्णिमा को मासिक यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी । यज्ञ की समाप्ति पर यजमानो और शिष्यों को रक्षा-सूत्र बाँधने की प्रथा थी । इसलिए इसका नाम रक्षा-बंधन प्रचलित हुआ । इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए ब्राह्मण आज भी अपने यजमानों को रक्षा-सूत्र बाँधते है। इसी दिन ब्राह्मण वर्ग आज भी श्रावणी उपक्रम भी संपन्न करता हैं  अर्थात जनेऊ/यग्योपवीत बदलने का कार्य करता है। बाद मे इसी रक्षा-सूत्र को राखी कहा जाने लगा ।

हिन्दू धर्म मे प्रत्येक पूजा कार्य मे हाथ मे कलावा ( धागा ) बांधने का विधान है। यह धागा व्यक्ति के उपनयन संस्कार से लेकर उसके अन्तिम संस्कार तक सभी संस्करों में बांधा जाता है। राखी का धागा भावनात्मक एकता का प्रतीक है।  स्नेह व विश्वास की डोर है। धागे से संपादित होने वाले संस्कारों में उपनयन संस्कार, विवाह और रक्षा बंधन प्रमुख है।

पुरातन काल से वृक्षो को रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा है। बरगद के वृक्ष को स्त्रियां धागा लपेटकर रोली, अक्षत, चंदन, धूप और दीप दिखाकर पूजा कर अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती है। आंवले के पेड़ पर धागा लपेटने के पीछे मान्यता है कि इससे उनका परिवार धन धान्य से परिपूर्ण होगा।

वह भाइयों को इतनी शक्ति देता है कि वह अपनी बहन की रक्षा करने मे समर्थ हो सके। श्रवण का प्रतीक राखी का यह त्यौहार धीरे-धीरे राजस्थान के अलावा अन्य कई प्रदेशो मे भी प्रचलित हुआ और सोन, सोना अथवा सरमन नाम से जाना गया ।

♦ कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते हुए ब्राह्मण निम्न मंत्र का उच्चारण करते है :

” येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल: ।
तेन त्वां प्रति बच्चामि, रक्षे! मा चल, मा चल ।। “

अर्थात् रक्षा के जिस साधन (राखी) से अतिबली राक्षसराज बली को बाँधा गया था, उसी से मै तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तू भी अपने कर्तव्यपथ से न डिगना अर्थात् इसकी सब प्रकार से रक्षा करना ।

रक्षा बंधन का उल्लेख हमारी पौराणिक कथाओं व महाभारत मे मिलता है और इसके अतिरिक्त इसकी ऐतिहासिक व साहित्यिक महत्ता भी उल्लेखनीय है। रक्षाबंधन से सम्बंधित पूजा के लिए हिन्दू पंचांग अनुसार दोपहर के बाद का समय (अपराह्न ) ही सर्वश्रेठ माना गया है।अपराह्न के बाद रक्षाबंधन के लिए केवल प्रदोष काल ही उपयुक्त  है ।

रक्षाबंधन के लिए सबसे अधिक अनुपयुक्त समय भद्रा माना गया है। भद्रा काल हिन्दू वेदो के अनुसार किसी भी तरह के शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है, इसीलिए जहाँ तक हो सके भद्रा काल में रक्षा बंधन से सम्बंधित कोई भी पूजा नहीं करनी चाहिए ।

उत्तर भारत के कई प्रान्तो मे प्रातः काल मे राखी/ रक्षा सूत्र बंधने की प्रथा है। यहाँ ये बात ध्यान देने लायक है कि पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्थ मे भद्रा काल होता है। अतः रक्षा सूत्र या राखी बंधने और पूजन के समय के लिए भद्रा काल के समाप्त हो जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए ।

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♦ राखी /रक्षाबंधन 2016 के लिए शुभ महूर्त :

इस वर्ष 2016 मे रक्षा बंधन का त्यौहार 18 अगस्त, को मनाया जाएगा। पूर्णिमा तिथि का आरम्भ 17 अगस्त 2016 को दोपहर बाद से आरंभ होगा किंतु भद्रा व्याप्त रहेगी। इसलिए शास्त्रानुसार यह त्यौहार 18 अगस्त को संपन्न किया जाए तो अच्छा रहेगा। परंतु परिस्थितिवश यदि भद्रा काल मे यह कार्य करना हो तो भद्रा मुख को त्यागकर भद्रा पुच्छ काल मे इसे करना चाहिए।

जब भी कोई कार्य शुभ समय मे किया जाता है, तो उस कार्य की शुभता मे वृ्द्धि होती है। भाई- बहन के रिश्ते को अटूट बनाने के लिये इस राखी बांधने का कार्य शुभ मुहूर्त समय मे करना चाहिए। वर्ष 2016  मे श्रावणी पूर्णिमा तिथि का आरम्भ 17 अगस्त 2016 को हो जाएगा । परन्तु भद्रा व्याप्ति रहेगी । इसलिए शास्त्रानुसार यह त्यौहार 18 अगस्त को 5:55 से 14:56 या 13:42 से 14:56 तक मनाया जा सकता है ।

सामान्यत: उतरी भारत जिसमे पंजाब, दिल्ली, हरियाणा आदि मे प्रात: काल मे ही राखी बांधने का शुभ कार्य किया जाता है। परम्परा वश अगर किसी व्यक्ति को परिस्थितिवश भद्रा-काल मे ही रक्षा बंधन का कार्य करना हो, तो भद्रा मुख को छोड्कर भद्रा-पुच्छ काल मे रक्षा – बंधन का कार्य करना शुभ रहता है। शास्त्रों के अनुसार मे भद्रा के पुच्छ काल मे कार्य करने से कार्यसिद्धि और विजय प्राप्त होती है। परन्तु भद्रा के पुच्छ काल समय का प्रयोग शुभ कार्यों के के लिये विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए ।

♦ 18 अगस्त (बृहस्पतिवार), 2016  को रक्षा बंधन मुहूर्त :

» 05:55 से 14:56 तक

♦ अपराह्न काल में रक्षाबंधन 2016  के लिए शुभ महूर्त:

» 13:42 से 14:56

(वर्ष 2016 में रक्षाबंधन के दिन भद्रा सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी)
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आइए रक्षाबंधन के इस पावन पर्व पर जानें कैसे बांधे अपने भाई को राखी : 

» प्रातः स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।

» अब दिनभर मे किसी भी शुभ मुहूर्त मे घर मे ही किसी पवित्र स्थान पर गोबर से लीप दे। लिपे हुए स्थान पर स्वस्तिक बनाएं।

»  स्वस्तिक पर तांबे का पवित्र जल से भरा हुआ कलश रखे।

»  कलश मे आम के पत्ते फैलाते हुए जमा दे।

»  इन पत्तो पर नारियल रखे।

»  कलश के दोनो ओर आसन बिछा दे। (एक आसन भाई के बैठने के लिए और दूसरा स्वयं के बैठने के लिए)

»  अब भाई-बहन कलश को बीच मे रख आमने-सामने बैठ जाएं।

»  इसके पश्चात कलश की पूजा करे।

»  फिर भाई के दाहिने हाथ मे नारियल तथा सिर पर टॉवेल या टोपी रखे।

» अब भाई को अक्षत सहित तिलक करे।

»  इसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधे।

» पश्चात भाई को मिठाई खिलाएं, आरती उतारे और उसकी तरक्की व खुशहाली की कामना करे।

» अगर भाई आपसे उम्र मे बड़ा हो तो भाई के चरण स्पर्श करे और अगर बहन उम्र मे बड़ी हो तो भाई राखी बंधने के पश्चात बहन के चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त करे।

» इसके पश्चात घर की प्रमुख वस्तुओ को भी राखी बांधे। जैसे- कलम, झूला, दरवाजा आदि।

शुभम भवतु… कल्याण हो….

by Pandit Dayanand Shastri.