क्या 9 जून 2017 (शुक्रवार) से मार्गीय हुए गुरु(बृहस्पति) के कारण हुआ किसान आंदोलन पर प्रभाव…????

ज्योतिष विद्या के माध्यम से फलादेश प्रत्यक्ष रूप से घटित भी होता है। ग्रहों का समाधान भी ज्योतिष विद्या के माध्यम से ही संभव है। ग्रहों के लिए किया जा रहा समाधान लाभकारी साबित भी हो रहा है।ज्योतिषमय ग्रह पिंड समग्र बह्मांड व पृथ्वी पर अवछिन्न गति से प्रसारित होता है। ग्रह पिंडों का प्रभाव मनुष्यों पर पड़ता है। इन प्रभावों को फलदायी बनाने के लिए ग्रहों का समाधान करना जरूरी होता है।वैसे भी इस संवत का मंगल राजा है ,ब्रह्सपत मंत्री है-हिंसक प्रदर्शन होते रहेगे-किन्तु भारतीय सेना का पलड़ा भारी रहेगा
 
समस्त ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव भी पृथ्वी पर पडता है,सूर्य और चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख और समझ सकते है,सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख सकते है,जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार का आना इसी प्रभाव का कारण है,पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है,मनुष्य के अन्दर भी पानी की मात्रा अधिक होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानव मस्तिष्क पर भी पडता है,पूर्णमासी के दिन होने वाले अपराधों में बढोत्तरी को आसानी से समझा जा सकता है,जो पागल होते है उनके असर भी इसी तिथि को अधिक बढते है,आत्महत्या वाले कारण भी इसी तिथि को अधिक होते है, आयुर्वेद भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है,कहा भी जाता है कि “संसार का प्रत्येक अक्षर एक मंत्र है,प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है,और प्रत्येक मनुष्य एक अपना गुण रखता है,आवश्यकता पहिचानने वाले की होती है”,’ग्रहाधीन जगत सर्वम”,विज्ञान की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग का गोला है,जिससेसभी ग्रह पैदा हुए है,गायत्री मन्त्र मे सूर्य को सविता या परमात्मा माना गया है।
 
ज्योतिष के सन्दर्भ में कारण और निवारण का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत की श्रेणी मे ज्योतिष को तभी रखा जा सकता है,जब उसे पूरी तरह से समझ लिया जाये | विज्ञान की परिभाषा के अनुसार ‘सिद्धांतों, नियमों, प्रयोगों, समालोचनाओं एवं प्रेक्षण के आधार पर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वह विज्ञान है’ | अब हमें यह विचार करना है कि क्या ज्योतिषशास्त्र इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरता है जिससे इसे विज्ञान कहा जा सकता है | वर्तमान में बृहस्पति कन्या राशि में भ्रमणरत होकर वक्रीय चल रहे हैं, साथ ही शनि का वक्रत्व काल भी दशम चतुष्पद दृष्टि संबंध बना रहा है। माना जाता है कि वक्री शुभ ग्रह यदि अन्य पाप ग्रह से दृष्टि संबंध बनाते हैं तो हानिकारक, प्राकृतिक परिवर्तन तथा बाजार में नकारात्मक स्थिति बनती है।
 
वक्री ग्रहों के संबंध में ज्योतिष प्रकाशतत्व में कहा गया है कि-“क्रूरा वक्रा महाक्रूराः सौम्या वक्रा महाशुभा।।” अर्थात क्रूर ग्रह वक्री होने पर अतिक्रूर फल देते हैं तथा सौम्य ग्रह वक्री होने पर अति शुभफल देते हैं। जातक तत्व और सारावली के अनुसार यदि शुभग्रह वक्री हो तो मनुष्य को राज्य, धन, वैभव की प्राप्ति होती है किंतु यदि पापग्रह वक्री हो तो धन, यश, प्रतिष्ठा की हानि होकर प्रतिकूल फल की संभावना रहती है। जन्म समय में वक्री ग्रह जब गोचरवश वक्री होता है तो वह शुभफल प्रदान करता है बशर्ते ऐसे जातक की शुभ दशांतर्दशा चल रही हो। क्या हैं वक्री ग्रह: फलित ज्योतिष के अनुसार जब कोई ग्रह किसी राशि में गतिशील रहते हुए अपने स्वाभाविक परिक्रमा पथ पर आगे को न बढ़कर पीछे की ओर (उल्टा) गति करता है तो वह वक्री कहा जाता है। जो ग्रह अपने परिक्रमा पथ पर आगे को गति करता है तो वह मार्गी कहा जाता है। वक्री ग्रह कुंडली में जातक विशेष के चरित्र-निर्माण की क्रिया में सहायक होते हैं। जिस भाव और राशि में वे वक्री होते हैं उस राशि और भाव संबंधी फलादेश में काफी कुछ परिवर्तन आ जाता है। 
 
वक्रि शनि के कारण/इस  दौरान विश्व में और देश में कई उग्र घटनाएं हुईं. कहीं दक्षिण चीन सागर में अमरीका ने युद्धपोत भेजे, कहीं कश्मीर में उग्र घटनाएं हुई, और अब यह उग्र किसान आंदोलन | हम कई दिनों से इसे शनि की वक्र चल से जोड़कर देख रहे थे | हालाँकि अब गुरु के मार्गी हो जाने से परिस्थितियां कुछ नियंत्रण में भी आएँगी | शनि गुरू की राशि धनु में 26 जनवरी, 2017 को प्रवेश कर चुका है, लेकिन एक संक्षिप्त समय के लिए वो फिर से वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा। वर्ष 2017 के तहत शनि 142 दिन तक वक्री गति से गुजरेगा, जो कि करीब 4 महीने आैर 22 दिन की अवधि होगी। शनि धनु राशि में 6 अप्रेल, 2017 से वक्रि हुआ और 20 जून, 2017 तक वक्री रहेगा आैर इसके बाद ये वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा, लेकिन ये निरंतर 25 अगस्त, 2017 तक वक्री गति में गोचर करेगा। वृश्चिक राशि में इसका असामान्य ठहराव 26 अक्टूबर, 2017 को खत्म होगा जिसके बाद धनु में शनि का गोचर फिर से शुरू होगा।
 
जानिए वक्री गुरु का प्रभाव:— 
गुरु विद्या-बुद्धि और धर्म-कर्म का स्थाई कारक ग्रह है। मनुष्य के विकास के लिए यह अति महत्वपूर्ण ग्रह है। गुरु का मनुष्य के आंतरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक जीवन पर समुचित प्रभाव पड़ता है। गोचरवश गुरु के वक्री रहते हुए धैर्य व गम्भीरता से कार्य की पकड़ कर नई योजना व नए कार्यों को गति देनी चाहिए। जिन जातकों के जन्म समय में गुरु वक्री हो, उनको गोचर भ्रमणवश वक्री होने पर अटके कार्यों में गति एवं सफलता मिलेगी और शुभ फलों की प्राप्ति होगी। 
 
जानिए बृहस्पति और अन्य राशिगत प्रभाव:— 
जब कोई शुभ ग्रह वक्री होकर किसी अशुभ ग्रह से दृष्टि संबंध बनाता है तो उसके अशुभ फलों में कमी आकर शुभत्व में वृद्धि होती है। अतः इस दौरान शनि की ढैया से पीड़ित मेष व सिंह राशि के जातक एवं साढ़ेसाती से प्रभावित तुला, वृश्चिक व धनु राशि के व्यक्तियों को राहत मिलेगी, उनके बिगडे़ और अटके काम बनने लगेंगे। वक्री गुरु के प्रभाव से अन्य समस्त राशियां भी प्रभावित होंगी। 
 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की नवग्रहों में देवगुरु का पद लिए हुए बृहस्पति के मार्गीय होने से ग्रह गोचर में अनुकूलता आएगी। वर्तमान में बृहस्पति कन्या राशि में भ्रमणरत होकर वक्रीय चल रहे हैं। साथ ही शनि का वक्रत्व काल भी दशम चतुष्पद दृष्टि संबंध बना रहा है।
 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शुभग्रहों का वक्रत्व काल अच्छा नहीं माना जाता है। क्योंकि वक्री शुभ ग्रह यदि अन्य पाप ग्रह से दृष्टि संबंध बनाते हैं तो प्राकृतिक परिवर्तन के साथ घटनाओं में भी इजाफा होता है। बाजार के अलग-अलग क्षेत्रों में कपड़ा, तेल, कोयला, रसायन, धातु, शासकीय कार्य आदि प्रभावित होते हैं। इससे बाजार में उतार चढ़ाव की स्थिति बनती है। वर्तमान में वैश्विक परिदृश्य को देखें तो यह स्थिति नजर आती है। 9 जून 2017 को बृहस्पति के मार्गीय होते ही इसमें बदलाव दिखाई देगा।
 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार  देवगुरु बृहस्पति को खाद्य पदार्थों का कारक ग्रह माना जाता है। भारतीय ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह को भाग्य, धर्म, अध्ययन, ज्ञान विवेक, मोक्ष, दांपत्य में स्थिरता, यात्रा, क्रय-विक्रय, शयनकक्ष व अस्वस्थता व उपचार का कारक माना जाता है। बृहत पाराशर होरा शास्त्रनुसार नवग्रह में से बृहस्पति सर्वाधिक रूप से मनुष्य पर प्रभाव डालता है। कालपुरुष सिद्धांतानुसार बृहस्पति को सातवें और नवें घर का कारक माना गया है। वर्तमान गोचर के अनुसार भाग्य, साझेदारी व मैत्री का कारक बृहस्पति कन्या राशि में है। कालपुरुष सिद्धान्त के अनुसार कन्या राशि छठे भाव को संंबोधित करती है। कन्या राशि के वैरी, विवाद, कलह, शत्रु, रोग, पीढ़ा और दुर्भाग्य को सूचित करता है। वैश्विक धर्म कारक, मैत्री कारक, भाग्य कारक, मित्र कारक और सद्भावना कारक बृहस्पति का काल पुरुष के छठे भाव अर्थात बैरी स्थान पर आना एक बड़ी ज्योतिषी घटना माना जा सकता है। इस ज्योतिषीय घटना के कारण विश्व धर्म गुरु भारत का पड़ोसी देशों के साथ में कन्‍फ्यूजन पैदा करेगा। बृहस्पति के कन्या राशि में आने से लोगों और देशों की धार्मिक भावनाएं आहात होंगी। 
 
बृहस्पति के इस गोचर से विश्व स्तर पर आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक उथल-पुथल रहेगी। आर्थिक दृष्टि से यह समय अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक रहेगा। कालपुरुष सिद्धान्त के अनुसार कन्या राशि को भूतल पर उगी हरियाली माना गया है और मीन राशि को आकाश माना गया है। इस ज्योतिषीय घटना से आकाश के स्वामी बृहस्पति में भूतल पर उगी हरियाली के रूप में आना खनिज, कच्चे तेल, खाद्यान, सब्जियों, अनाज के भावों में बहुत बड़ी उथल-पुथल रहेगी। कच्चे तेल के दाम अकस्मात रूप से उठेंगे इसी के साथ ही कच्चे तेल के दाम धड़ाम से अपने निम्न स्टार पर भी आ सकते हैं। यही हाल सोने का भी रहने वाला है।
 
शास्त्रानुसार ग्रहों का पथ भ्रमण अति महत्वपूर्ण है। ग्रह मार्ग बदलते हैं वक्रिय व मार्गीय होते रहते हैं। ज्योतिष मान्यतानुसार वक्री शुभ ग्रह यदि अन्य पाप ग्रह से दृष्टि संबंध बनाए तो हानिकारक, प्राकृतिक परिवर्तन व बाजार में नकारात्मक स्थिति बनती है। वैदिक पंचांग के अनुसार शुक्रवार दिनांक 09.06.17 को वट पूर्णिमा अर्थात जेष्ठ पूर्णिमा पर बृहस्पति का मार्गीय होना शुभ रहेगा। बृहस्पति के मार्गीय होते सभी जातकों को राहत मिलेगी। किसानों को लाभ मिलेगा। बाजार में कपड़ा, तेल, कोयला, रसायन, धातु में तेज़ी आएगी। कारोबारियों हेतु समय उन्नति कारक रहेगा। कृषि में लाभ की स्थिति बनेगी। शासकीय कार्य सुचारू होंगे। सोने के भाव कम होंगे व बैंकिंग सैक्टर में ब्याज दर की कमी आएगी।
 
बृहस्पति का काल पुरुष के वैरी भाव में आना लोगों के मन पर गहरा असर डालेगा। इस ज्योतिषीय घटना से विश्व को अचंभित करने वाले परिणाम देखने पड़ सकते हैं। इसके प्रभाव से देशों के बीच चल रही संधि के बीच दरार पैदा होगी। जो धार्मिक शीत युद्ध जैसे हालत पैदा करेगी। दिग्दर्शन प्रणाली के अनुसार बृहस्पति उत्तर पूर्व दिशा को संबोधित करता है तथा कन्या राशि पश्चिम को संबोधित करती है अर्थात समस्या भारत से उत्तरी, उत्तर-पश्चिमी तथा पश्चिमी देशो के साथ जन्म लेगी। इसमें से कन्या राशि प्रधान उत्तरी, उत्तर-पश्चिमी तथा पश्चिमी देश जैसे की पाकिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्की, पनामा और पोलैंड आदि देशों में आर्थिक, धार्मिक और वैचारिक उन्माद पैदा होगा क्योंकि भारत एक धनु प्रधान राशि वाला देश है अतः इस ज्योतिषीय घटना का प्रभाव भारत पर भी बड़े रूप में देखा जा सकता है। इसका प्रभाव भारत के उत्तरी, उत्तर-पश्चिमी तथा पश्चिमी राज्यों में सर्वाधिक रूप से दिखाई देगा। इन राज्यों में भी लोगों की धार्मिक भावनाएं आहात होंगी। 
 
जानिए कब होते हैं गुरु वक्री:— 
बृहस्पति अपनी धुरी पर 9 घंटा 55 मिनट में पूरी तरह घूम लेता है। यह एक सेकेंड में 8 मील चलता है तथा सूर्य की परिक्रमा 4332 दिन 35 घटी 5 पल में पूरी करता है। स्थूल मान से गुरु एक राशि पर 12 या 13 महीने रहता है। एक नक्षत्र पर 160 दिन व एक चरण पर 43 दिन रहता है। बृहस्पति ग्रह अस्त होने के 30 दिन बाद उदय होता है। उदय के 128 दिन बाद वक्री होता है। वक्री के 120 दिन बाद मार्गी होता है तथा 128 दिन बाद पुनः अस्त हो जाता है।
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शनि वक्री 2017 धनु में – 
आइये शनि के क्रम संशोधन को समझें …
 
ज्योतिष में, शनि का वृश्चिक में गोचर सबसे रहस्यपूर्ण आैर जटिल घटनाआें में से एक है। हालांकि, वृश्चिक शनि के शत्रु मंगल की राशि है, लेकिन शनि इस राशि में सहज महसूस करते है। वृश्चिक राशि को अभिव्यक्त करें तो इनका स्वभाव जिम्मेदार, कठोर, अनुशासनप्रिय होते है आैर इन्हें सामान्यतः अपनी भावनाआें को व्यक्त करना पसंद नहीं है। इस तरह जब शनि इस राशि में आता है तो शनि की प्रक्रिया सामान्य से अलग हो जाती है। यहां बैठकर शनि ज्यादा कठोर हो जाते है आैर लोगों को जिम्मेदारी का अहसास कराते है। शनि लोगों को जीवन की वास्तविक कठिनार्इयों का सामना कराता है। वृश्चिक में शनि का गोचर इस साल जनवरी में समाप्त हुआ था, लेकिन ये सुनिश्चित करना चाहता है कि वृश्चिक में अपने पारगमन के दौरान जो जिंदगी का सबक उसने सिखाया है, उसे ठीक ढंग से समझा गया है। इस कारण, ये वक्री गति से पारगमन करेगा।
 
वक्री शनि 2017 धनु में – क्या उम्मीद ? 
वक्री शनि कुछ अप्रत्याशित बदलाव ला सकता है आैर अद्वितीय विकास हो सकते है। अगर आप कोर्इ नया या महत्वपूर्ण काम या प्रोजेक्ट शुरू करने की योजना बना रहे है, तो सभी विकल्पों पर अच्छे से विचार करें, क्यूंकि शनि आपके दृढ़ संकल्प आैर उद्देश्य की भावना का परीक्षण करने की कोशिश कर सकता है। शनि आपको उन कामों की याद दिलाएगा जिन पर आपने हाल के दिनों में काम करना शुरू किया था, लेकिन ध्यान या रूचि में कमी के कारण उन्हें अधूरा छोड़ दिया था। शनि के वक्री होने के दौरान, स्थिति को बनाए रखना आैर लंबित कार्यों को पूरा करना बेहतर रहेगा। शनि का वक्री गोचर खूब सारी सकारात्मकता के साथ नकारात्मक परिणाम भी लाएगा।